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Saturday, June 25, 2022
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    19 जनवरी 1990 में बेघर हुए कश्मीरी पंडितों की कहानी

    दिल्ली: 19 जनवरी वो तारीख है, जिसको भुलापना कश्मीरी पंडितों के लिए नामुमकिन है. आज इस घटना को 31 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन आज भी विस्थापित कश्मीरी पंडित उस दिन को भुला नहीं पाए हैं. कश्मीर के अलगाववाद के बाद कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हुआ था.

    कई नामी लोगों की हत्या के बाद घाटी के हालात बिगड़ने लगे थे, जिसके बाद कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया. आज भी इस तारिख को कश्मीरी पंडित ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ के रूप में मानते हैं. उस दौरान कई निर्दोष कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया था, उनके घर जला दिए गए थे, मंदिर बर्बाद किये गए, महिलाओं के साथ बलात्कार हुए और पुरुषों की निर्मम हत्याएं हुई. उग्रवादियों ने लूटपाट की वारदात को अंजाम देना शुरू कर दिया था, जन्नत में हर ओर मौत और दहशत का माहौल था. कश्मीर में हथियार बंद आंदोलन शुरू होने के रात 3 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित अपना घर और जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर हो गए.7 नवंबर 1986 से लेकर 11 जनवरी 1990 में फ़ारुक़ अब्दुल्ला की नेशनल कॉफ्रेंस सरकार थी. लेकिन इस दर्दनाक घटना के बाद 7 सालों (19 जनवरी से लेकर 9 अक्टूबर 1996) तक जम्मू -कश्मीर में राज्यपाल शासन रहा.


    इस घटना के बाद कश्मीर से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों से हमने कुछ बातचीत की –
    Khushboo Mattoo-
    बातचीत के दौरान उन्होंने बताय की इस घटना से उनके जीवन में क्या असर हुआ उन्हें कितनी कठनाइयों का सामना करना पड़ा और किस दर्द से वो और उनका परिवार गुजरा. उनका मानना है, कि ये पूरी घटना की योजना पहले से रची गयी थी. जिस वक़्त उन्हें अपना घर अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी उस वक़्त सरकार ने भी उनका साथ नही दिया. इस घटना के बाद उन्हें और उनके परिवार को गरीबी का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया की आज भी कश्मीर जाने पर उन्हें मेहमानों जैसा आभास कराया जाता है. अपने घर में मेहमान होना किसी को अच्छा नई लगता.
    Versha Koul-
    बातचीत के दौरान वर्षा ने बताया की अचानक से कश्मीर के माहौल में बदलाव आने लगा मेरी दादी के सामने एक मिलिटेंट को मारा गया. हिन्दू विरोधी स्लोगन्स दीवारों पर लगाए गए. उन्होंने कहा आज भी कई पंडितों को लगता है की वो वापस कश्मीर जाएंगे तो वो वहां सुरक्षित नही हैं. क्योंकि अब उनका भरोसा ख़तम हो चूका है.वर्षा का मानना है की इस घटना को अंजाम देने में राजनीती और इस्लामिक संगठन दोनों का हाथ था. क्योंकि वहां के लोगों को लगता था की हिन्दू उनके लिए रूकावट थे.

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