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Thursday, June 23, 2022
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    ए जिंदगी तू कब लौटेगी फिर से, आंखें बिछाए बैठे हैं तेरे इंतजार में हम कबसे

    दिल्ली: पूर्व हुए दिल्ली दंगों के बारे में जब भी लिखने बैठती हूँ. हर बार मेरी कलम कांप उठती है. चारों तरफ गम का समंदर दिखता है. स्याही खुद खून से नहाती है. कहीं सड़कों पर सोते लोग, भूख से रोते बिलखते चेहरे, सूने सपनों की अंधेरी गलियां. और क्या क्या लिखूं? यूं तो प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बहुत कुछ दिखाया व पढ़ाया जा रहा है पर बहुत कुछ ऐसा है. जो कोई भी नहीं जानता और ना ही जाना चाहता है. कल कुछ ऐसे परिवारों से मिलना हुआ, जो सड़क किनारे रहकर अपना गुजर-बसर करते हैं. आज वह भीख मांगने पर मजबूर हैं. अक्सर चलते-फिरते सब ने देखा होगा कि सड़कों के किनारे गाड़ियां लोहारों ( लोहे के सामान बनाने वाली एक जाति) की झुग्गियां पड़ी होती हैं. जी हां यह वही गाड़िया लोहार है जो इतिहास के पन्नों में कहीं सिमट कर रह गए हैं.

    कहते हैं 16वीं शताब्दी में इनके पूर्वज महाराणा प्रताप की सेना में थे और यह लोग उनके सेना के लिए लोहे के औजार बनाया करते थे. महाराणा प्रताप के प्रबल सहयोगी की भूमिका निभाने वाली यह जाति विषम परिस्थितियों में रहकर आज भी अपने वचन पर अडिग है. इन लोगों ने प्रण लिया था कि जब तक संपूर्ण मेवाड़ को मुगलों से वापस नहीं छुड़ा लेते, तब तक हम मेवाड़ नहीं लौटेंगे. बैलगाड़ी ही इनका घर बन गई और यह खानाबदोश की जिंदगी जीने लगे. समय बदलता गया और कारवां आगे बढ़ता गया. अब बैलगाडीयां भी लुप्त होने लगी थी. ऐसे में सड़क किनारे फुटपाथ पर ही अपना डेरा डालकर इधर से उधर भटकने पर मजबूर यह आज भी अपनी कसम निभा रहे हैं. चाहे जेठ की तपती दोपहरी हो या हांड कंपाने वाली ठंड यह स्वयं ही सभी समस्याओं का सामना करते हैं और उसी लोहार के काम को करके वह अपने पूरे परिवार का पालन करते हैं लेकिन कुछ बेरहम लोगों से वह भी बर्दाश्त नहीं हुआ.

    दिल्ली के उत्तर-पूर्वी कोने में शिव विहार की एक बस्ती में रहने वाले लगभग 20 परिवारों के तंबूओं को दंगों की रात 24 फरवरी 2020 को आग लगा दी गई, जिस समय लोग भोजन करके विश्राम की अवस्था में होते हैं. अपने सतरंगी सपनों में खोए रहते हैं. उस समय उनका सब कुछ अग्नि में स्वाहा कर दिया गया. किसी तरह वह लोग अपनी वह अपने परिवार की जान बचा पाए, जो बेघर सड़क पर थे. उनके लिए अब सड़कें भी नहीं रही थी. 18 से 20 परिवार में लगभग डेढ़ सौ लोग थे, जिनके साथ मारपीट भी की गई. बड़ी बेरहमी से उनको मारा पीटा गया. उनके घरों को लूट कर आग लगा दी गई. बड़ी-बड़ी मीडिया घरानों ने भी इस घटना को नहीं दिखाया क्योंकि सरकार ऐसा नहीं चाहती थी. 25 फरवरी 2020 की दोपहर को भूख से तड़पते बच्चों को लेकर एक महिला घर-घर खाना मांग रही थी. किसी ने कुछ खाने-पीने को दिया तो किसी ने दुत्कार कर भगा दिया. वैसे भी कोई किसी को कितने दिन खिला देगा पर डूबते को तिनके का सहारा होता है.

    एक बच्ची ने बताया कि इस बस्ती को रात में जला दिया गया है. मैंने जो मंजर देखा वह बहुत भयानक था. कभी-कभी सब कुछ लिख पाना संभव नहीं होता. शब्दों का भी अपना संचय होता है, जो कहीं ना कहीं पर आकर रुक ही जाता है पर अंर्तमन की वेदना स्मृतियों मे ठहर जाती है और कभी भी कहीं भी नेत्रों से छलक जाती है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनका ना कोई पुश्तैनी घर है और ना अब रोजगार बचा है. आज के मशीनी युग में उनके द्वारा बनाए गए औजार लोगों के लिए बेमतलब हैं. सरकार को भी उनकी कोई सुध नहीं, फिर भी उनकी इच्छाशक्ति में कोई अंतर नहीं आया है. जिंदगी की सारी सुविधाओं को अंगूठा दिखाने वाला यह समुदाय आज भी उतना ही सहज है, जितना वर्षों पूर्व था. यह राष्ट्रवादी इच्छाशक्ति उन्हें किसी प्रवचन से नहीं मिली बल्कि प्रकृति की संगत से उपजी है जो उन्हें इतनी दूर तक ले आई. वर्तमान स्थिति यह है कि इनके पास अभी जीवनयापन यापन करने के लिए कुछ नहीं बचा. सरकारी मदद पाने के लिए इनके पास न आधार कार्ड है और ना ही बैंक अकाउंट और ना यह लोग शिक्षित हैं. ये लोग पूंर्णतः समाज पर ही आश्रित हैं. एक महिला ने रोते-रोते बताया कि हमारे पास तो बर्तन भी नहीं बचे हम खाना किस में बनाएंगे? उसके शब्द कानों अभी भी गूंज रहे है. समाज के प्रबुद्ध लोगों से आग्रह है कि इनकी पुनर्वास की चिंता भी करें.तभी हम सशक्त समाज का निर्माण कर पाएंगे और शायद उनकी जिंदगी फिर से पटरी पर लौट पाएगी. सबका प्रतिपल सुंदर हो और प्रतिदिन सुखकर हो इसी आशा के साथ…

    अंजु पांडे, सोशल वर्कर

    (यह लेखिका के अपने विचार है)

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