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Thursday, December 1, 2022
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    30 October 1990: लाठीचार्ज और गोलीबारी के बीच मंदिर गुंबद पर फहराया था झंडा

    अब से 31 साल पहले 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या आंदोलन के दौरान कारसेवकों को जान गंवानी पड़ी थी। सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उस दिन निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाई थी। 

    अर्द्ध सैनिकों की गोली से राम मंदिर के गुंबद पर झंडा फहराते हुए पांच कारसेवकों की मौत हुई थी, जबकि पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज से करीब चालीस कारसेवक पुलिस के लाठीचार्ज और गोलीबारी से घायल हुए थे। इस घटना के चलते ही मुलायम सिंह यादव देश भर में “मौलाना मुलायम” कहे जाने लगे। उनकी यह हिंदू विरोधी छवि अब तक मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी से हटी नहीं है। 

    दूसरी तरफ इसी काण्ड के चलते भाजपा और उसके सहयोगी संघटनों का राम मंदिर आंदोलन जन आंदोलन में तब्दील हो गया और देखते ही देखते बीजेपी राज्य और केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गई। 

    लखनऊ में ऐसे तमाम पत्रकार, अधिकारी और नेता मौजूद हैं, जो उस घटना के चश्मदीद गवाह हैं। इन लोगों के अनुसार, अयोध्या आंदोलन के क्रम में विश्व हिंदू परिषद ने हिंदू साधु-संतों द्वारा अयोध्या में कारसेवा करने का ऐलान किया था। जिसके तहत देश भर के साधु संत और श्रद्धालुओं को अयोध्या कूच करने को कहा गया। विहिप के इस कार्यक्रम को फ्लॉप करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह ऐलान किया कि सरकार के सुरक्षा प्रबंधों के चलते अयोध्या में कोई परिंदा पर भी नहीं मार सकता। उनके इस ऐलान के बाद भी देशभर से लाखों की संख्या में कारसेवक सुरक्षा प्रबंधों को धत्ता बताते हुए चोरी छुपे अयोध्या पहुंच गए। 

    लाठीचार्ज, आंसू-गैस और गोलीबारी के बीच उस दिन किस तरह कारसेवकों ने मंदिर परिसर में पहुचकर कारसेवा की थी और जय श्रीराम का उद्घोष किया था, यह भी उक्त घटना को कवर करने वाले पत्रकार भूले नहीं हैं। उस दिन सरकार के तमाम सुरक्षा प्रबंधों को नेस्तानाबूद करते हुए लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंच थे। विश्वहिंदू परिषद के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंघल की अगुवाई में सुबह हजारों कारसेवकों ने जब राममंदिर की तरफ बढ़ाना शुरू किया तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया।

    अशोक सिंघल के सर पर पुलिस की लाठी पड़ी, उनका सर फटा, सर से खून निकला। तो  कारसेवकों में राममंदिर पहुंचने का जूनून सवार हो गया। फिर देखते ही देखते अयोध्या में गली -गली से कारसेवकों के जत्थे निकलने लगे और सब लोग रामजन्मभूमि मंदिर की ओर चल पड़े। कारसेवकों को रोकने के लिए बनाए गए वैरीकेट एक-एक कर ध्वस्त होने लगे। पुलिस और कारसेवकों के बीच करीब छह घंटे तक हुए संघर्ष में लाखों कारसेवक रामजन्मभूमि परिसर के समीप तक पहुचने में सफल हो गए। 

    इनमें से सैंकड़ों कारसेवकों ने सरकार के सुरक्षा इंतजामों को फेल करते हुए विवादित ढ़ांचे के गुंबद पर झंडा फहरा दिया। गुंबद, दीवार, खिडकियों को कारसेवकों ने क्षतिग्रस्त किया गया तो अर्द्धसैनिक बलों ने तीन बार गोलियां चलाकर कारसेवकों को रोकने की कोशिश की। तो गुंबद पर झंडा फहराते हुए दो कारसेवक मरे। तीन नींव खोदते हुए मरे। तीस से अधिक कारसेवक घायल हुए। 

    अयोध्या में घटी इस घटना का अब आकलन करें तो यह पता चलता है कि उक्त घटना से उत्तर प्रदेश से लेकर देश की सियासत बहुत बदल हुए। वर्ष 1991 में हुए विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह बुरी तरह हारे और बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 

    अब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य हो रहा है। तीन दशक बीत जाने के बाद भी मुलायम सिंह जनता की बीच बनी अपनी इस छवि पूरी तरह तोड़ नहीं सके हैं। हालाँकि अब तो मुलायम सिंह यादव राजनीति में पहले की तरह सक्रिय नहीं हैं. 

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